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वास्तु की आठ दिशाएं

वास्तु की आठ दिशाएं1. पूर्व दिशा-

पहली दिशा ‘पूर्व दिशा’ है जहां से भगवान सूर्य उद्य होते हैं। आप जहां भी है वहां जिस दिशा से सूर्य की किरणे प्रात:काल उदय हो वह पूर्व दिशा कहीं जायेगी। इस दिशा को वास्तु शास्त्र में शुभ माना गया है। यहां तक की पूजा-प्रार्थना जैसे शुभ कार्य भी इस दिशा की तरफ मुख करके ही किये जाते है। यह दिशा नये जीवन का संकेत है अत: खुशहाली, उन्नति, स्वस्थ्य जीवन,  प्रभावशाली व्यक्तित्व के लिये  ये दिशा  सर्वोत्तम मानी जाती है।

किसी भी भवन इत्यादि का यदि प्रवेश द्वार इस दिशा की तरफ रखा जाये तो यह शुभ है साथ ही उस भवन में आने वालों को सकारात्मकता देता है।

2. दक्षिण पूर्व-

दक्षिण-पूर्व दिशा को अग्नि कोण माना जाता है। क्योंकि दक्षिण-पूर्व दिशा में अग्नि का वास होता है इसीलिये यहां किचन (रसोईघर) इत्यादि का होना शुभ है। यह दिशा ऊर्जा, जीवन शक्ति और तेज (बल) में वृद्धि देने वाली होती है। इस दिशा में दोष, अग्निकांड, अग्नि से भय, हानि, चिंता, अपयश को बढ़ाता है।

3. दक्षिण दिशा-

दक्षिण दिशा के स्वामी भगवान यम है। इन्हें मृत्यु का देवता कहा जाता है। इसीलिए इस दिशा को विशेष शुभ नहीं माना जाता और मांगलिक कार्य इस दिशा में वर्जित हैं। घर में दक्षिण दिशा का वास्तु दोष, ऊपरी बाधा, अपमान आदि से जीवन को प्रभावित करते हैं।

इस दिशा में पितरों का आशीर्वाद माना गया है। इसीलिये जब वास्तु में दोष दक्षिण दिशा से आये तो यह पितृतोष और उनके आशीर्वाद से वंचित रहने का संकेत बन जाता है। परिणामत: घर में रहने वालों का स्वास्थ्य खराब, कलह, क्लेष, भारी संकट इत्यादि देता है। अत: दक्षिण दिशा को शुभता देने से पितरों का आशीर्वाद व समृद्धि प्राप्त होती है।

4.  दक्षिण-पश्चिम-

दक्षिण-पश्चिम को नैऋत्य कोण भी कहा जाता है। इसका स्वामी राक्षस है। इस कोण के शुभ होने से जीवन में सफलता, धन, यश, इच्छाओं की पूर्ति होती है अन्यथा इस दोष में डिप्रैशन, रोग, भय इत्यादि तंग करते हैं।

5. पश्चिम दिशा-

यह दिशा वास्तु शास्त्र में पश्चिम की होती है। इसके स्वामी शनि देव है। इसके शुभ होने से व्यक्ति अनेक प्रकार की उन्नति, सुख-सुविधाओं और सफलता को पाता है। पश्चिम दिशा में दोष होने से आपसी रिश्तों में मन-मुटाव, पार्टनरशिप में धोखा, वैमनस्य पैदा होता है।

6. उत्तर-पश्चिम-

उत्तर-पश्चिम दिशा पर वायुदेव का अधिकार क्षेत्र है। इसीलिये इसे वायव्य कोण भी कहते हैं। भगवान वायु पवन पुत्र हनुमान के पिता है। यदि इस दोष को दूर किया जाये तो वायुदेव के आशीर्वाद से भाइयों में मधुर संबंध होते हैं। साथ ही इनके सहयोग से व्यक्ति के कार्य सिद्धि होते हैं। इस दिशा का दोष, भाइयों को शत्रु बनाता है, कानूनी विवाद में, पार्टनरशिप में धोखा इत्यादि परेशानी को पैदा करता है।

7. उत्तर दिशा-

उत्तर दिशा के अधिकारी भगवान कुबेर है। ये धन संपत्ति के स्वामी और देवताओं के कोषाध्यक्ष भी हैं। इनके आशीर्वाद से घर में लक्ष्मी का वास होता है। अनेक सुख सुविधाएं, वस्त्र, संपन्नता, वैभव, संपत्ति प्राप्त होती है। इस दिशा में यदि वास्तुदोष हो तो भारी आर्थिक संकट, दरिद्रता, वस्तुओं का अभाव होने लगता है। बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता अत: ये हर प्रकार से धन संपदा को देने वाली होती है।

8. उत्तर-पूर्व दिशा-

इस दिशा को ईशान कोण भी कहा जाता है। इसके स्वामी भगवान आशुतोष शिव हैं। इस दिशा की शुभता मन में शांति, भक्ति, संतोष देने के साथ यश, मान, संपदा जीवन में भर देती है। परंतु इस दिशा में दोष होने पर विपरीत परिस्थितियां मन में अशांति, संतान द्वारा चिंता, गर्भपात व संतानहीनता का प्रभाव दे सकती है। अत:  इस वास्तु दोष का निवारण आवश्यक है।
इन आठ प्रकार की दिशाओं को दोषमुक्त कर जीवन में सुख, समृद्धि, संतान, यश को पाया जा सकता है। अच्छा स्वास्थ्य व मन जीवन को सांसरिक व आध्यात्मिकता के पथ पर सुदृढ़ बनाता है।

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