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पुनर्विवाह कोई दोष नहीं

punarvivah पुनर्विवाह हमेशा से एक जरूरी लेकिन विवादास्पद मसला रहा है। लेकिन आज के लाइफ स्टाइल में यह सहजता से स्वीकार किया जाने लगा है। एक निजी चैनल पर इस नाम से प्रसारित हो रहे धारावाहिक ने भी इस प्रथा को बल दिया है। खासकर विधवाओं के पुनर्विवाह की आवश्यकता इस समाज को अब महसूस होने लगी है। सोच बदलने लगे हैं और बच्चों सहित पुनर्विवाह में जीवन साथी स्वीकारे जाने लगे हैं।

20 साल में ब्याही गई पुनम 24वें वर्ष विधवा हो गई। पुनम के मैके वाले ने पुनम के इंजीनियर देवर से पुनर्विवाह की बहुत कोशिश की, लेकिन देवर शादी के लिए तैयार नहीं हुआ। अंत में थक हार कर पुनम के मायके वाले निराश हो घर बैठ गये। उधर अनुकंपा पर सरकारी नौकरी तो उसे मिल गई थी, लेकिन पति की मौत के गम से उबरने में उसे लगभग दो साल लग गये। फिर जरूरत महसूस होने लगी, उसे एक जीवन साथी की और दो बच्चों के लिए पिता के प्यार की। सामाजिक जहोजहद में उलझी पुनम ने आखिर पांच वर्षों बाद एक अहम फैसला लिया, अपने लिए खुद से लड़का ढूंढ़ने का। उसकी मेहनत ने आखिर में रंग दिखाया और उसे अपने ही विभाग में एक ऐसा सजातीय लड़का मिल गया, जिसकी पत्नी ने तलाक दे दिया था । पुनम और उस लड़के दोनों को जरूरत थी एक दूसरे की। फिर क्या था कुछ मुलाकातों के बाद परिवार वालों की सहमति से दोनों ने पुनर्विवाह कर लिया और आज वो दोनों खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।

दरअसल पुनम एकलौती लड़की नहीं है जिसने पुनर्विवाह किया और सफलता पूर्वक अपना वैवाहिक जीवन जी रही है। आज हर युवा विधवाओं में अनकी अपनी फिलॉसफी है। उनका अपना दर्शन और तर्क है। भले ही वो मर्यादा में रहकर अपने बड़े बुजुर्गों के सामने मुंह नहीं खोलती या खोलना चाहती हैं लेकिन अब वो बैधव्य स्वीकारने को तैयार नहीं है। अपनी जिंदगी को अपने अंदाज से वो जीना चाहती हैं और सच तो ये है कि ये उनका अधिकार भी है। लोक-लाज की ढ़कोसला से परे हकीकत के आसमां में वो नई उड़ान भरना चाहते हैं। परिवार के लोग, खासकर नई पीढ़ी के लोग भी उन्हें विधवा बने देखना नहीं चाहते हैं। भले ही वो पहल न करें लेकिन अब सपोर्ट जरूर करन लगे हैं।

सच में जैसे पोलियो मुक्त, कालाजार और टीवी मुक्त समाज और देश के लिए योजनाएं चलाई जा रही है। वैसे ही विधवा विहिन समाज के लिए एक आंदोलन की जरूरत है। खासकर युवा विधवाओं को पहल करने की जरूरत है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। कारण है कि हमारे यहां वैदिक काल से ही विधवाओं के पुनर्विवाह की पंरपरा रही है।

तेजी से बदलते समाज में विधवाओं ने भी अपनी सीमाएं तोड़ने बैधव्य के बंधन से आजाद होने की शुरुआत कर दी है। अच्छी बात ये है कि समाज दबे मन से ही सही विधवा महिलाओं खासकर युवा विधवाओं की ऐसी पहल को स्वीकारने लगा है। यह और बात है कि कुछ दकियानुसी समाज इसका विरोध पुरुष प्रभाव को बनाये रखने के लिए आज भी करता है और तर्क भारतीय समाज की परंपरा और धर्म का देता है। लेकिन सच तो ये है कि भारत में अति प्राचीन काल से विधवाओं का पुनर्विवाह होता रहा है।

प्राचीन काल को पढ़ने और जानने वाले खूब अच्छी तरह जानते हैं कि उस समय हमारे यहां जिन विधवाओं ने पुनर्विवाह किया, उसे बेहिचक मान्यता मिलती रही थी। हां यह और बात है कि पुनर्विवाह करने वाली ऐसी विधवाओं को तब ‘पुनर्मू’ कहा जाता था। यानी कि एक खास नाम दिया गया ऐसी महिलाओं के लिए। लेकिन आज की तरह श्रृंगार के साथ इनके जीने का अधिकार नहीं छीना जाता था।

कहने का मतलब साफ है कि विधवा विवाह से हमारी परंपरा में प्राचीन काल में भी कोई परहेज नहीं था। वैदिक समाज में भी विधवाओं के विवाह पर प्रतिबंध नहीं था ऋगवेद में भी ऐसी कोई चर्चा नहीं मिलती। बल्कि ऐसा उल्लेख भी नहीं मिलता कि पति की मृत्यु के बाद विधवा हो गई स्त्री को पति के भाई या निकट के किसी पारिवारिक लोगों से शादी करनी होगी। साफ है कि उस समय भी विधवा हो चुकी स्त्री को किसी भी पुरुष के साथ विवाह करने का अपने-अपने तरीके से जीवन जीने का अधिकार प्राप्त था। सच तो यह है कि उस समय के धर्म शास्त्रकारों ने पति की मृत्यु की आशंका होने पर भी महिला को किसी दूसरे पुरुष के साथ विवाह की अनुमति दे रखी थी।

बात अगर वशिष्ट धर्म सूत्र (16/67) की करें तो महिलाओं या विवाहिता महिलाओं के प्रति और भी उदारता दिखती है। इस तरह विधवा महिलाओं से परे अन्य महिलाओं को भी पुनर्विवाह की अनुमति दी गई है। खासकर ब्राह्मण महिलाओं को जो अपने संतान के साथ रहती थी, या जिसके पति यात्रा पर गये हों और पांच वर्षों तक वापस नहीं लौटे हों अथवा वह अपने पति के पास जाने की इच्छुक नहीं होती तो उसे पुनर्विवाह की अनुमति थी। हां यह प्रितबंध जरूर था कि अगर परिवार में उपयुक्त व्यक्ति है तो वह बाहर के किसी व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकती थी। बेसंतर जातक में भी इसके प्रमाण हैं।

इंसान अपने ही फायदे के लिए नियम व कायदे कानून बनाता है। पुरुष समाज जब हावी हुआ तो विधवा महिलाओं के लिए कठोर नियम बना दिये, उनके लिए खास विधवा धर्म का निर्धारण कर दिया गया। लेकिन तब भी संतान विहिन विधवाओं के लिए एक खास व्यवस्था सामाजिक व्यवस्थाकारों ने दे दी थी। इस व्यवस्था को तब निवेग कहा गया। इस तरह पुत्रविहिन विधवा स्त्री अपने परिवार के बड़े बुजुर्गों की अनुमति या सहमति से बगैर विवाह किये ही अपने देवर से संतान उत्पति कर सकती थी। यह और बात है कि इस मंशा के पीछे पुरुषों का अपना ही स्वार्थ होता था।

अब सवाल उठता है कि जब प्राचीन काल में बैधब्य मुक्त होने या पुनर्विवाह करने की परंपरा थी तो फिर आज की पढ़ी-लिखी, अबला और सक्ष्म महिलाएं बैधब्य की विवशता क्यों झेलें। ये सवाल भी अब नया नहीं रहा। सती प्रथा की सच्चाई जब सामने आई तो भारतीय समाज ने इस विद्रूप प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंका।

{लेखक- मुकेश महान}

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