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वैदिक मान्यताः गर्भाधान कब, क्यों और कैसे ?

वैदिक मान्यताः गर्भाधान कब, क्यों और कैसे ? प्रत्येक समाज, वर्ग एवं परिवार की किसी भी युवती का गर्भधारण उसके मन, शरीर एवं मस्तिष्क की स्वस्थता के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक नैतिकता के अधार पर संस्कार-सम्मत माना जाता है। इनमें मानवीयता को सर्वोपरि स्थान दिया गया है, जिसका विचार विज्ञान और हिंदू धर्म ग्रंथों में बारीकी से बताया गया है। इसके अनुसार किसी भी लड़की को तब तक गर्भ धारण नहीं करना चाहिए जब तक कि उसमें शारीरिक और मानसिक परिपक्वता न आ जाए तथा वह सामाजिक और पारिवारिक संस्कारों में न बंध जाए। इस जैविक प्रक्रिया का संबंध प्रकृति, माहौल और सभ्य समाज के साथ है। यह समझें कि इनके बीच आपसी तालमेल बना हुआ है। किसी एक के कमजोर पड़ने का सीधा असर गर्भाधान और स्त्री-पुरुष एवं भावी शिशु पर भी पड़ता है।

गर्भाधान की वैदिक मान्यताः हिंदू धर्म के वैदिक मंत्रों में गर्भाधान के स्वरूप को दर्शाया गया है। क्योंकि यह मात्र किसी शिशु के जन्म देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे समस्त मानव जाति का प्रतिनिधित्व भी है। गर्भ में आने वाले शिशु का भविष्य भी इसी के ऊपर निर्भर करता है।

एक वैदिक मंत्र में स्पष्ट कहा गया है, कि संतान माता-पिता की आत्मा, हृदय और शरीर से उत्पन्न होती है। इस कारण माता-पिता के शारीरिक और मानसिक गुण-अवगुण संतान में आना स्वाभाविक है। संतानोत्पत्ति से पहले मानसिक और शारीरिक शुद्धि अनिवार्य है, जो गर्भाधान संस्कार से मिलता है। एक सवाल पूछा जाता है कि क्या चंद श्लोकों, मंत्रों के उच्चारण एवं देवों के पूजन से शारीरिक और मानसिक शांति संभव है? इसका जवाब हां में ही दिया जाता है। क्योंकि मनुष्य के अच्छे-बुरे होने में उसके मन की अहम् भूमिका होती है। मन ही सांसारिक कष्टपूर्ण बंधन और सुखमय असर का कारण बनता है। ऐसे में उसके प्रवाह और प्रभाव को समझना तथा उसके अनुकूल बनना आवश्यक है। इन्हीं से संस्कार के विधान को अपनाना संभव हो पाता है और मंत्र व्यक्ति के मन को संयमित आचरण और सात्विक भावों से भर देता है। पशुता का भाव आने देने से रोक देता है तथा सृष्टि की महता को समझने में मदद करता है। इसे मानते हुए गर्भाधान शास्त्र सम्मत होना चाहिए। कामवासना की शांति से संपन्न गर्भाधान की मान्यता पर न केवल हमेशा प्रश्न चिन्ह लगा रहेगा, बल्कि इससे जब-तब मन को आशांति मिलती रहेगी।

संस्कार का योगदान गर्भ में पलने वाला शिशु एक पूर्णपुरुष और स्त्री का अंश होता है। उसकी अपनी प्रकृति होती है, लेकिन वह देवों और मातृ एवं पितृ ऋण से युक्त होता है। इसका असर उसके भावी मानव शरीर के निर्माण पर पड़ता है। वह अपने माता-पिता की भावनाओं के काफी करीब होता है। वह उनकी सोच और व्यावहार को अपना लेता है या फिर उसमें वैसी प्रकृति, मनोवृति और योग्यता-अयोग्यता के स्वरूप का बीजारोपण हो जाता है, जो उसके माता-पिता से गर्भाधान के समय ही मिल जाते हैं। चंचल मन को ठीक उसी रूप में अपनाता है जिस रूप में उसके माता-पिता के होते हैं। साथ ही वह अपने माता-पिता की जैविकता को भी अपनाता है और उसी के अनुरूप शारीरिक और मानसिक स्वस्थता को भी प्राप्त करता है। इन सभी के संदर्भ में हमारे संस्कार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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