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वास्तु : पूजा स्थल कहां और कैसे ?

वास्तु : पूजा स्थल कहां और कैसे ? घर का सपना सबसे अहम और महत्वपूर्ण होता है। सभी के लिए। अपना घर हो अथवा किराये का सभी अपने घर को सजाकर और संवार कर रखते हैं। और ऐसे में उनके लिए एक शोचनीय बात यह होती है कि अपने घर में भगवान के लिए कौन सा स्थान सही होगा। भगवान के लिए घर अर्थात पूजा घर या पूजा स्थल। यह बड़ा सवाल है कि घर में पूजा स्थल कौन सी जगह पर होनी चाहिए मूर्तियों या तस्वीरों की दिशा क्या होनी चाहिए। यह भी सच है कि आज जगह के आभाव में घर में अलग से पूजा का कमरा बनाना संभव नहीं है। फिर भी छोटे से छोटे घर में भी पूजा का स्थान जरूर होता है।

उत्तर-पूर्व के कोण को ईशान कोण माना गया है। ईशान कोण वैसे भी देवताओं का स्थान माना गया है। यहां स्वयं भगवान शिव का भी वास होता है। देव गुरु बृहस्पति और केतु की दिशा भी ईशान कोण ही माना गया है। यही कारण है कि यह कोण पूजा-पाठ या अध्यात्म के लिए सबसे बेहतर होता है। घर में एक से अधिक पूजा स्थल नहीं होना चाहिए। अन्यथा परेशानी बढ़ सकती है।

1.पूजा गृह भवन में उत्तर-पूर्व ईशान कोण, उत्तर व पूर्व दिशा में ही होना चाहिए।

2.पूजा गृह कभी भी शयन कक्ष में नहीं बनायें।

3.पूजा गृह में प्रकाश साउथ, ईस्ट और अग्नि कोण दिशा में लगायें।

4.पूजा गृह में किसी प्राचीन मंदिर से लाई हुई मूर्ति नहीं रखनी चाहिये।

5.पूजा गृह में महाभारत के चित्र, पशु-पक्षी के चित्र तथा वास्तु पुरुष का भी चित्र नहीं लगाना चाहिये।

6.पूजा गृह में उत्तर की ओर या पूर्व की ओर मुख करके ही पूजा करनी चाहिए। ध्यान के लिये उत्तर दिशा उत्तम होती है।

7.पूजा गृह को सदैव शुद्ध व पवित्र रखें। कोई भी अपवित्र वस्तु नहीं रखनी चाहिए।

8.पूजा के कमरे में जहां भगवान का मंदिर है या जहां गणपति की मूर्ति रखी हो उसके ऊपर की मंजिल में शौचालय का निर्माण नहीं करना चाहिए। वरना दुर्घटनाएं, कष्ट व मानिसक विकार होंगे। व्यापार में हानि होगी। कर्जा बढ़ जाएगा।

9.पूजा गृह में शुद्ध देसी घी का ही दीपक जलाना चाहिये।

10.उत्तर-पूर्व दिशा हमेशा खाली रखनी चाहिये। उत्तर क्षेत्र से आने वाली चुम्बकीय ऊर्जा ध्यान करने वालों या अध्ययन करने वाले बच्चों के लिये उत्तम है। स्मृति यानि-यादाश्त के लिये यह ऊर्जा तरंगे श्रेष्ठ होती हैं।

11.पूजा गृह में मूर्ति या चित्र को साफ करने वाला कपड़ा अन्य कपड़ों से अलग ही रखना चाहिए। इस्तेमाल फूलमाला व प्रसाद को अगले दिन हटा देना चाहिये। घर में फूलमाला गलने व सड़ने नहीं देना चाहिए। अन्यथा अपयश व धन हानि होगी। बच्चों को यादाश्त कमजोर होने लगेगी।

12.पिरामिड की आकृति का यदि मंदिर या ध्यान कक्ष बनवाया जाय। उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुंह करके ध्यान व अध्ययन करने से यादाश्त या स्मृति दीर्घकाल तक बनी रहती है।

13.उत्तर-पूर्व या ईशान कोण दिशा के बाहर ऊँचा पेड़ या टीला नहीं होना चाहिए। वरना व्यापार में हानि और कर्जा बढ़ेगा। स्वस्थ्य गिरेगा, मानसिक कष्ट व विकार बढ़ेंगे।

14.पूजा गृह में धन व कीमती सामान नहीं रखना चाहिये।

15.पूजा गृह में मूर्तियां कभी भी ठीक दरवाजे के सामने नहीं होनी चाहिये।

16.पूजा गृह में हवन कुण्ड सदैव अग्नि कोण दक्षिण पूर्व में ही रखना चाहिये।

17.ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र, सूर्य व कार्तिकेय का मुख हमेशा पूर्व व पश्चिम की ओर होना चाहिये। गणेश, कुबेर, दुर्गा का मुख दक्षिण की ओर होना चाहिये। हनुमान जी का मुख नैऋर्ति कोण में ही होना चाहिये।

18.पूजा गृह में मूर्तियां एक-दूसरे की ओर मुख करती नहीं होनी चाहिए।

अगर आप अपने घर में सही स्थान और सही दिशा में पूजा स्थल बनवाकर सही तरीके से पूजा करते हों तो निश्चित रूप से वहां से साकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होगा। जो आपको स्वास्थ तो रखेगा ही सुखी और सामर्थ्यवान भी बनाएगा।

{ लेखक- मुकेशश्री }

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