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क्यों और कैसे करें तंत्र साधना ?

क्यों और कैसे करें तंत्र साधना ?तंत्र को सामान्य बोलचाल की भाषा में साधना का मार्ग भी कहा गया है। साधना अर्थात किसी कार्य को करने से पहले किया गया अध्ययन-चिंतन-मनन है। तंत्र साधना हमें सरल राह दिखाने में सहायक है तो कठिन और दुरूह मार्ग पर दौड़ लगाने के लिए तरीके भी बताता है। इसलिए इसे अभिष्टकारी मार्ग भी कहा गया है। इसमें ज्ञान, योग, भक्ति और कर्म सभी समाहित होते हैं। ज्ञान से अगर किसी कार्य को समझने में मदद मिलती है, तो योग से उसे पूरा करने की तकनीकी जानकारी हासिल होती है। इसी तरह से भक्ति से उस कार्य के प्रति समर्पण की भावना आती है और  तभी हम कर्म की ओर अग्रसर हो पाते हैं।  ये सभी  परस्पर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। यानि किसी एक के छूट जाने मात्र से कार्य अधूरा रह जाता है। इन्हें कदापि एक-दूसरे के विरोधी नहीं समझना चाहिए। यही तंत्र का मूल आधार है, जिनके जरिये विकट से विकट राह भी आसान बन जाती है।

साधना से ज्ञान की प्राप्ति होती है तो विभिन्न प्रयत्नों से योग अर्थात समाधि लगाने से प्राप्त ज्ञान को संबल मिलता है। इसी तरह से श्रद्धा-भक्ति हो तभी ज्ञान की प्राप्ति और हठ योग जैसी साधना संभव हो पाती है। भक्ति के मार्ग पर चलकर साधक ज्ञान को समृद्ध कर संतुलित कर लेता है और साम्राज्य की प्रप्ति के क्रम में अग्रसर हो जाता है। इसके बाद जो कर्म का सिलसिला चल पड़ता है उसमें बाधा नहीं आती है, जिससे साधक सफलता को हासिल कर लेता है। यही तंत्र के सरल और सहज इस्तेमाल का मूलमंत्र है। हर चेष्टा की पूर्ति में संलिप्त रह कर सहजता के साथ कर्मपथ को अपना लेना ही तंत्र को स्वीकार लेना है। इसलिए कहा गया है कि तंत्र साधना भोग और मोक्ष दोनों को देता है।

यह कहें कि कार्य की सिद्धी मनुष्य को भोग की ओर ले जाती है और इसी भोग में मोक्ष भी छिपा होता है। भोग सापेक्ष होता है। इसकी सापेक्षता ही हमें मोक्ष दिलाती है। जैसे जब हम किसी को कुछ देते हैं तो हमें जो सुखानुभूति होती है, वह हमारे भोग के बाद की स्थिति को दर्शाता है। इंद्रीय शक्ति को हासिल करने तथा इन्हें सुचारु रूप से संचालित बनाने में तंत्र की अहम भूमिका रहती है। इसी वजह से तंत्र में पंचमकार को साधना के रूप में स्वीकार किया गया है। अर्थात जो मनुष्य अपनी पांचों इंद्रियों का इस्तेमाल करता है वही तंत्र की महत्ता को समझ सकता है।

तंत्र का शब्दिक अर्थ नियम, सिद्धांत, व्यवहार, सहयोग और व्यभिचार से संबंध रखता है। भारतीय परंपरा के अनुसार शक्ति की उपासना का विशेष स्थान रहा है। इसे स्वस्थ जीवन देने वाला माना गया है तो शरीर और मन की शुद्धि का वाहक भी बताया गया है। तंत्र उसमें सहायक की भूमिका निभाता है। तन और त्रो से बने शब्द तंत्र में तत्व को अपने अधीन करने की अद्भुत ताकत होती है। हालांकि तंत्र का अर्थ साधारण तौर पर देवताओं के पूजन और उनकी अराधना से है। देवताओं की पूजा  से प्रकृति और परमात्मा को अनुकूल बनाया जा सकता है। इस तरह से परमेश्वर की उपासना में जो भी उपयोगी साधना होती है, वही तंत्र साधना कहलाता है। साधारण बोलचाल की भाषा में तंत्र का शाब्दिक अर्थ, परिपथ या किसी निश्चित व्यवस्था से है। इसे एक तरह का नेटवर्क भी कहा जा सकता है। इस नेटवर्क में अगर पूरी दुनिया समाहित है तो उससे व्यक्ति के जीवन की दिनचर्या से लेकर उसके पारिवारिक और सामाजिक संपर्क एवं संबंध का भी मेल संभव हो पाता है।

तंत्र साधना को जादू-टोने का एक ज़रिया समझना भूल है। यह पंचमकार यानी मद्य, मांस, मीन, मुद्रा, मैथुन को दर्शाता है।  इंद्रीय भोग में लिप्त लोगों के लिए यह साधना के एक अंग की तरह है। आध्यात्म, धर्म और उपासना तीनों दैनिक जीवन में आवश्यक हैं। यह प्रतिदिन की सरल जीवनयापन के समान उपयोगी हैं। इसका ज्ञान तंत्रशास्त्र ने हर व्यक्ति के भीतर ही पैदा किया है। इसके बाद ज़रूरत सिर्फ इच्छाशक्ति और आध्यात्मिकता को अपने भीतर उतारने की है।

तंत्र साधना के लिए स्त्री हो या पुरुष दोनों को समान अधिकार दिया गया है। मनाही सिर्फ अविवाहित के लिए है, क्योंकि तंत्र की साधना के अधिकार को संयुक्त कर्म के रूप में बताया गया है। तंत्र को स्त्री और पुरुष के संगम एवं प्रणय के विधि-विधान के साथ जोड़ा गया है। बताया गया है कि किसी भी साधक का एकाधिक शक्ति और साधिका का एकाधिक भैरव का रूप ग्रहण करना तंत्र में है। सरल और सहज स्वभाव हर युवक में होता है। उसकी आसक्ती, किसी स्त्री की ओर होने को नकारा नहीं जा सकता है। न ही इस प्रभाव-स्वभाव से उन्हें मुक्त किया जा सकता है। इस आकर्षण से अपने मन को बरबस हटाने का आदेश तंत्र नहीं देता है। इसी के साथ जीवन के कई तार जुड़े होते हैं, जिनके सहारे कई कार्य संपादित हो जाते हैं। यह कहा जा सकता है कि स्त्री-पुरुष के संग में ही आध्यात्मवाद की उन्नति संभव है।

तंत्र साधना से भागवान शिव की भी साधना पूरी हो जाती है। साथ ही इसके साधक में बलिदान जैसे स्वाभाविक बदलाव भी आ जाते हैं। बलिदान का तात्पर्य उसमें आए आचरण और आत्मीय बदलाव से है, समर्पण से है। समर्पण किसी भी रूप में हो सकता है। कर्म के प्रति, अपने प्रियजन के प्रति, समाज के प्रति या फिर देश के प्रति। इसी समर्पण में खुशियों के क्षण छिपे होते हैं।

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