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शुक्रवार व्रत: भौतिक सुख – समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है

शुक्रवार व्रत: भौतिक सुख - समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैप्ताह के पांचवें दिन उपवास के साथ रखा जाने वाला शुक्रवार व्रत संतोषी माता की पूजा से संबंधित है। इसे सर्व सुख कामना, मान-सम्मान, संतान और राज्य-साम्राज्य की प्रप्ति के लिए सोलह सप्ताह किया जाता है। इसकी विशेषता खट्टा खाने की मनाही को लेकर भी है। धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिष के अनुसार शुक्र के कमजोर होने या नीच नीच राषि में होने की स्थिति में यौन समस्यायों, रोगों या दूसरे कारणों से दांपत्य जीवन में असंतुष्टि की स्थिति बन जाती है। शंकालु स्वाभाव शुक्र के कमजोर होने पर आ जाती है।

क्यों करें शुक्रवार व्रत ?

यदि आप दांपत्य सुख में कमी महसूस कर रहे हों। आप सशंकित स्वाभाव से ग्रसित हो गए हों। जिनकी कुंडली में शुक्र ग्रह कमजोर स्थिति में होता है, उनके लिए इस व्रत को विधिवत करने से चमत्कारी लाभ मिलता है। ज्योतिष विज्ञान में शुक्र ग्रह न केवल भौतिक सुख देने वाला माना गया है, बल्कि  यह यौन अंगों और वीर्य को भी प्रभावित करता है। अर्थात शुक्र का जीवन में सुख और सुंदरता के प्रति आकर्षण पैदा करने के साथ-साथ ‘काम शक्ति की प्रप्ति में महत्वपूर्ण भूमिक निभाता है। जिस किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र के उच्च और अच्छे योग होते हैं उन्हें पर्याप्त यौन सुखों की प्राप्ति होती है। लंबा समय गुजर जाने के बावजूद  संतान सुख नहीं मिल पाया हो। जीवन में सुख की सरसता, सौभाग्य और धन-धान्य की कमी आ गई हो। किसी काम में बाधा आ रही हो। कुंडली में शुक्र का योग मंगल और केतु के साथ बन रहा हो। ऐसे में विधिवत शुक्रवार व्रत करना चाहिए।

कैसे करें शुक्रवार व्रत ?

1. इस व्रत को शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार से शुरु किया जाता है। हालांकि श्रावण माह के पहले शुक्रवार को शुरु करने से लक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है। स्त्री या पुरुष दोनों को यह व्रत करना चाहिए। इस दिन मां संतोषी की पूजा की जाती है, जो लक्ष्मी का ही एक रूप है। इनकी आराधना इस प्रकार करनी चाहिए।

2. व्रत के दिन स्नान आदि के बाद सफेद वस्त्र में पूजा की तैयारी करनी चाहिए। घर के इशान कोण में मां संतोषी की तस्वीर स्थापित करनी चाहिए।

3. पूजा के इस्तेमाल की जानी सामग्रियों में धूप, दीप, कलश, चंदन, सफेद फूल, चावल, गुड़, भूना चना और सुपाड़ी  मुख्य है।

4. पूजा से पहले कलश को जल से भर देना चाहिए। उसके ऊपर गुड़ और भूने हुए चने से भरा कटोरा रखना चाहिए।

5. पूजा के बाद मां संतोषी व्रत की कथा सुननी चाहिए। आरती कर गुड़-चने को प्रसाद के रूप में वितरित कर देना चाहिए। व्रत के अंत में स्वयं भोजन करना चाहिए।

6. इस व्रत के उद्यापन के लिए अंतिम अर्थात सोलहवें शुक्रवार को विशेष तैयारी करनी होती है। पुड़ी, खीर पकवान के साथ नैवेद्य रखे जाते हैं, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी होता है कि उनमें रत्तीभर भी नमक और खट्टे पदार्थ का इस्तेमाल नहीं हुआ हो। विधिवत पूजा के बाद मां संतोषी की आराधना करते हुए नरियल फोड़ना चाहिए।

7. प्रसाद के रूप में तैयार किये गए पकवान आठ लड़कों को श्रद्धापूर्वक खिलाया जाना चहिए। सामर्थ के अनुसार उन्हें दछिणा भी देना चाहिए। साथ ही उस दिन उन्हें खट्टा खाने से मना किया जाना चाहिए।

विशेष-

शुक्र दोष से ग्रसित व्यक्ति को ग्रह को अपने अनुकूल बनाने के लिए शुक्रवार व्रत के अलावा ज्योतिषीय सलाह भी माननी चाहिए। अच्छे योग देख कर शुक्र का रत्न पहनना चाहिए। सांड को गुड़ खिलाना तथा भिक्षुक को भोजन करवाने का विशष महत्व है। यह व्रत अनैतिक संबंधों और यौन रोगों से भी छुटकारा दिलाता है। अविवाहित लड़कियों को यह व्रत करने से उन्हें सुयोग्य जीवनसाथी मिलता है। व्रत के दौरान अर्गला स्तोत्र का पाठ करने से अकल्पनीय लाभ होता है । लक्ष्मी कृपा स्तोत्र का पाठ प्रति दिन करने से माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है  ।

विकलांग लोगों को खट्टे-मीठे फल खिलाना चाहिए। सामर्थ के अनुसार अंध विद्यालय में दान देना अच्छा होता है।

(लेखक: शंभु सुमन)

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